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नज़्म
ज़ख़्म-ए-तमन्ना
एक फूल का चमन में तलबगार मैं हुआ
वो फूल खिल रहा था सर-ए-शाख़ आरज़ू
जुनैद हज़ीं लारी
ग़ज़ल
दिल के हर ज़ख़्म-ए-तमन्ना की क़बा जलती है
ग़म का वो जोश-ए-नुमू है कि फ़ज़ा जलती है