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ग़ज़ल
ज़बान-ए-क़ाल को दे कर सुकूत का पैग़ाम
ज़बान-ए-हाल से पैहम उसी की बात करो
अबु मोहम्मद वासिल बहराईची
ग़ज़ल
सिपह-गरी तो बुज़ुर्गों के साथ दफ़्न हुई
हमें तो आज फ़न-ए-क़ील-ओ-क़ाल आता है
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
ग़ज़ल
सिपह-गरी तो बुज़ुर्गों के साथ दफ़्न हुई
हमें तो आज फ़न-ए-क़ील-ओ-क़ाल आता है
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
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ग़ज़ल
सुलगना अंदर अंदर मिस्रा-ए-तर सोचते रहना
बदन पर डाल कर ज़ख़्मों की चादर सोचते रहना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
मैं कि ख़ुद राह में भूल आई हूँ असबाब-ए-सफ़र
कोई मंज़िल का पता पूछ रहा है मुझ से
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
शब-ए-फ़िराक़ की ज़ुल्मत में ग़म के मारों का
तिरे ख़याल की ताबिंदगी ने साथ दिया