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ग़ज़ल
शरीक-ए-बुलबुल-ओ-क़ुमरी हैं वो ज़बूँ-फ़ितरत
जो बे-क़रार रहे सैर-ए-गुलसिताँ के लिए
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
नज़्म
ऐ ज़मिस्ताँ की हवा तेज़ न चल
ऐ ज़मिस्ताँ की हुआ तेज़ न चल
इस क़दर तेज़ न हो मौज-ए-सुबुक-ख़ेज़ की रौ
असलम अंसारी
नज़्म
दावत-ए-नज़र
मैं ही मैं हूँ कोई हुश्यार कहे जाता है
वो ही वो हैं कोई सरशार कहे जाता है
अली मंज़ूर हैदराबादी
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ग़ज़ल
शाइ'र हैं 'फ़िराक़' और भी इस दौर में लेकिन
ये रंग-ए-बयाँ रंग-ए-ज़बाँ और ही कुछ है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
बड़ी मुद्दतों में आ कर ये खुला है मुझ पे 'फ़ितरत'
कि बयान-ए-ग़म की ख़ातिर मैं ज़बान-ए-चश्म-ए-तर था
अब्दुल अज़ीज़ फ़ितरत
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबी
उफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबी
अल्लामा इक़बाल
शेर
मेरी घुट्टी में पड़ी थी हो के हल उर्दू ज़बाँ
जो भी मैं कहता गया हुस्न-ए-बयाँ बनता गया
फ़िराक़ गोरखपुरी
हास्य
वो ज़बाँ जो है 'फ़िराक़' ओ 'शाद' ओ 'शंकर' की ज़बाँ
उस ज़बाँ की क्यूँ मुसलमानी किए देते हैं आप
साग़र ख़य्यामी
ग़ज़ल
दीप उल्फ़त के हर इक दिल में जलाते चलिए
हैं जो दुनिया में अंधेरे वो मिटाते चलिए