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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ये चौथा पैग है ऊँ-हूँ ज़लालत की गई मुझ से
ज़लालत की गई मुझ से ख़यानत की गई मुझ से
जौन एलिया
नज़्म
इल्तिजा
मुमकिन है ज़माना रुख़ बदले ये दौर-ए-हलाकत मिट जाए
ये ज़ुल्म की दुनिया करवट ले ये अहद-ए-ज़लालत मिट जाए
आमिर उस्मानी
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नज़्म
बादा-ए-इश्क़ से सरशार गुरु-नानक थे
रह-ए-तारीक-ए-ज़लालत में पए ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
शम्अ-सा मज़हर-ए-अनवार गुरु-नानक थे
श्याम सुंदर लाल बर्क़
ग़ज़ल
नफ़ासत आह भरती है ज़लालत खिलखिलाती है
भरी दुनिया में या-रब मैं कभी ख़ुद को तना देखूँ
गीतेश दुबे गीत
नज़्म
ईद का चाँद देख कर
और अगर ईद मनाना है तो जान-ए-ग़ुर्बत
संग-ए-मेहनत से ये कश्कोल-ए-ज़लालत तोड़ो
मोअज़्ज़म अली खां
ग़ज़ल
ग़रज़ क्या है मिरी तक़दीर को पूछे जो ये मुझ से
तलबगार आबरू का है यहाँ तू या ज़लालत का
बासिर टोंकी
नज़्म
ग़रीबों की दुनिया
बुराई की रग़बत दिलाती है ग़ुर्बत
ज़लालत में आख़िर गिराती है ग़ुर्बत

