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ग़ज़ल
ऐ फ़िक्र-ए-सुख़न क्यों ज़र-ए-गुल ख़ाक से ले आऊँ
मज़मून अगर कम हों तो अफ़्लाक से ले आऊँ
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
हमेशा सैर-ए-गुल-ओ-लाला-ज़ार बाक़ी है
अगर बग़ल में दिल-ए-दाग़-दार बाक़ी है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
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नज़्म
निशान-ए-ज़िंदगी
एक हरकत हो तो सौ अक्स बना लेते हैं
उन की आँखों में खटकता है ज़र-ओ-माल मिरा