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नज़्म
आख़िरी रात
सियाही बन के छाया शहर पर शैतान का फ़ित्ना
गुनाहों से लिपट कर सो गया इंसान का फ़ित्ना
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
जो न नक़्द-ए-दाग़-ए-दिल की करे शो'ला पासबानी
तो फ़सुर्दगी निहाँ है ब-कमीन-ए-बे-ज़बानी
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
प्यार-भरी उम्मीदों पर अग़्यार की वो ज़र-पोश निगाहें
काँटों के पैवंद लगा कर तू ने फूल बिखेरे दिल में