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ग़ज़ल
तबीअ'त बे-नियाज़-ए-लज़्ज़त-ए-ग़म होती जाती है
किसी से क्या मिरी दिल-बस्तगी कम होती जाती है
राजेश कुमार औज
ग़ज़ल
कैसी चमक कहाँ की खटक उफ़ रे बे-हिसी
हैं मस्त ज़ौक़-ए-लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-निहाँ से हम
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
बहुत मुश्किल है पास-ए-लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर करना
किसी से इश्क़ करना और वो भी उम्र भर करना
जमील मज़हरी
ग़ज़ल
चखी न जिस ने कभी लज़्ज़त-ए-सिनान-ए-निगाह
मज़ा दे फिर उसे क्या तेग़-ए-ख़ूँ-चकान-ए-निगाह
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
लज़्ज़त-ए-एहसास-ए-ग़म से दिल को बहलाते रहे
कुछ अधूरे ख़्वाब थे रह रह के याद आते रहे

