aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zauq-e-lazzat-e-dushnaam"
मकतबा ज़ाैक़-ए-सलीम, दिल्ली
पर्काशक
साक़ी-ए-अरबाब-ए-ज़ौक़
योगदानकर्ता
हलक़ा-ए-अरबाब-ए-ज़ौक़, हैदराबाद
हल्क़ा-ए-अरबाब-ए-ज़ौक़, नई दिल्ली
हलक़-ए-अरबाब-ए-ज़ोक़
संपादक
हलक़ा-ए-अरबाब-ए-ज़ौक़, लाहौर
अंजुमन अरबाब-ए-ज़ौक़, लायलपुर
अब हर्फ़-ए-ना-सज़ा में भी उन को दरेग़ हैक्यूँ मुझ को ज़ौक़-ए-लज्ज़त-ए-दुश्नाम हो गया
यूँही ऐ लज़्ज़त-ए-आज़ार रहोमर मिटो जिस पे उसे मार रहो
फिर आश्ना-ए-लज्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर हैं हमफिर महरम-ए-कशाकश-ए-हर-ख़ैर-ओ-शर हैं हम
बहुत मुश्किल है पास-ए-लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर करनाकिसी से इश्क़ करना और वो भी उम्र भर करना
दिल-दादगान-ए-लज़्ज़त-ए-ईजाद क्या करेंसैलाब-ए-अश्क-ओ-आह पे बुनियाद क्या करें
हम आम तौर पर दुश्मन से दुश्मनी के जज़्बे से ही वाबस्ता होते हैं लेकिन शायरी में बात इस से बहुत आगे की है। एक तख़्लीक़-कार दुश्मन और दुश्मनी को किस तौर पर जीता है, उस का दुश्मन उस के लिए किस क़िस्म के दुख और किस क़िस्म की सहूलतें पैदा करता है इस का एक दिल-चस्प बयान हमारा ये शेरी इन्तिख़ाब है। हमारे इस इन्तिख़ाब को पढ़िए और अपने दुश्मनों से अपने रिश्तों पर अज़-सर-ए-नौ ग़ौर कीजिए।
Zauq-e-Adab
अकबर अली ख़ाँ
Lazzat-e-Sehra-Nawardi
ज़हरा दाऊदी
नारीवाद
Zauq-e-Talab-o-Justuju
अख़लाक़ हुसैन अारिफ़
मज़ामीन / लेख
Anjuman Zauq-e-Adab Rampur
र्शफ़ ज़ैदी
Lazzat-e-Sang
सआदत हसन मंटो
Masnavi Lazzat-e-Ishq
तसद्द्क़ हुसैन
Zauq-e-Midhat
नात
005
बशीरुद्दीन बशीर वारसी
May 1986ज़ौक़-ए-नज़र
Shumara Number-015,016
May, Jun 1987ज़ौक़-ए-नज़र
Shumara Number-001
Jan 1985ज़ौक़-ए-नज़र
Shumara Number-007
Jul 1986ज़ौक़-ए-नज़र
Shumara Number-002
Feb, Mar 1985ज़ौक़-ए-नज़र
Shumara Number-005,006
Jun 1985ज़ौक़-ए-नज़र
Shumara Number-008
Aug 1985ज़ौक़-ए-नज़र
Shumara Number-005
तबीअ'त बे-नियाज़-ए-लज़्ज़त-ए-ग़म होती जाती हैकिसी से क्या मिरी दिल-बस्तगी कम होती जाती है
बदल-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार कहाँ से लाऊँअब तुझे ऐ सितम-ए-यार कहाँ से लाऊँ
ख़ूगर-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार था इतना 'आतिश'दर्द भी माँगा तो पहले से सिवा माँगा था
मुझ को महव-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार रहने दीजिएमेरी गर्दन पर यूँही तलवार रहने दीजिए
दिल मुब्तला-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार ही रहामरना फ़िराक़-ए-यार में दुश्वार ही रहा
किस दिल से तर्क-ए-लज़्ज़त-ए-दुनिया करे कोईवो ख़्वाब-ए-दिल-फ़रेब कि देखा करे कोई
'ताबिश' हवस-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार कहाँ तकराहत से ये ग़म फिर भी मिरे यार कहाँ तक
रखता है तल्ख़-काम ग़म-ए-लज़्ज़त-ए-जहाँक्या कीजिए कि लुत्फ़ नहीं कुछ गुनाह का
हसरत-ए-लज़्ज़त-ए-दीदार लिए फिरती हैदर-ब-दर कूचा-ओ-बाज़ार लिए फिरती है
दिल को रहीन-ए-लज़्ज़त-ए-दरमाँ न कर सकेहम उन से भी शिकायत-ए-हिज्राँ न कर सके
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