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ग़ज़ल
बहुत ज़ोरों से हँस पड़ता हूँ मैं बिन बात के अक्सर
मैं यूँ आँसू बहाने के बहाने ढूँड लेता हूँ
चन्द्र शेखर वर्मा
ग़ज़ल
इस ज़माने में ख़मोशी से निकलता नहीं काम
नाला पुर-शोर हो और ज़ोरों पे फ़रियाद रहे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
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नज़्म
सफ़ीर-ए-लैला-1
परों को ज़ोरों से फड़फड़ाते थे और सेहनों में दौड़ते थे
यहीं था सब कुछ सफ़ीर-ए-लैला
अली अकबर नातिक़
ग़ज़ल
जब मिला मुझ को समुंदर बस यही कहता मिला
प्यास ज़ोरों की लगी है और पानी चाहिए
प्रशांत शर्मा दराज़
ग़ज़ल
याद-ए-अय्यामे कि था ज़ोरों पे जज़्ब-ए-हुस्न-ओ-इश्क़
वो मिरे दिल का तड़पना बे-क़रारी आप की
तअशशुक़ लखनवी
हास्य
अहिंसा के पस-ए-पर्दा बहुत ज़ोरों पे तय्यारी
अमन के नाम पर जंगी जो पहले थी सो अब भी है
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
शेर
इस ज़माने में ख़मोशी से निकलता नहीं काम
नाला पुर-शोर हो और ज़ोरों पे फ़रियाद रहे