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शेर
ज़रा उन की शोख़ी तो देखना लिए ज़ुल्फ़-ए-ख़म-शुदा हाथ में
मेरे पास आए दबे दबे मुझे साँप कह के डरा दिया
नवाब सुल्तान जहाँ बेगम
ग़ज़ल
ब-क़द्र-ए-ज़ौक़-ए-तलब मय अता हो रिंदों को
ये मै-कदा है यहाँ रस्म-ए-बेश-ओ-कम क्यों हो
मजीद खाम गानवी
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ग़ज़ल
तिरी ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म ने नए सिलसिले निकाले
मिरी सीना-चाकियों से जो बना मिज़ाज-ए-शाना
जमील मज़हरी
ग़ज़ल
क्या मिला मिटा कर हम तीरगी के मारों को
अब सँवारिए अपनी ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म तन्हा
मुबारक मुंगेरी
ग़ज़ल
ज़ंजीर-ए-ग़म है ख़ुद मिरी ख़्वाहिश का सिलसिला
या ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म कि सलासिल कहें जिसे
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
कहीं खुली तो नहीं ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म उस की
इक इज़्तिराब का 'आलम मिरे ग़ुबार में है