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ग़ज़ल
कर दिया ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ सा परेशाँ मुझ को
दश्त में छोड़ गया है दिल-ए-नादाँ मुझ को
जमीला ख़ुदा बख़्श
ग़ज़ल
मुसहफ़-ए-रुख़्सार पर ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ देख कर
हूँ परेशाँ कुफ़्र के साए में ईमाँ देख कर
रियाज़ ग़ाज़ीपुरी
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ग़ज़ल
दिल ख़ुश न हुआ ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ से निकल कर
पछताए हम इस शाम-ए-ग़रीबाँ से निकल कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
दिल ख़ुश न हुआ ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ से निकल कर
पछताए हम इस शाम-ए-ग़रीबाँ से निकल कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
किस को सौदा तिरा ए ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ होगा
कौन पाबंद-ए-बला-ए-शब-ए-हिज्राँ होगा
अब्दुल मजीद ख़्वाजा शैदा
ग़ज़ल
ये रुख़-ए-यार नहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के तले
है निहाँ सुब्ह-ए-वतन शाम-ए-ग़रीबाँ के तले
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ज़ल
हुआ है सर में सौदा फिर किसी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ का
न दामन की ख़बर हम को न होश अपने गरेबाँ का