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ग़ज़ल
मुसहफ़-ए-रुख़्सार पर ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ देख कर
हूँ परेशाँ कुफ़्र के साए में ईमाँ देख कर
रियाज़ ग़ाज़ीपुरी
ग़ज़ल
दिल ख़ुश न हुआ ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ से निकल कर
पछताए हम इस शाम-ए-ग़रीबाँ से निकल कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
दिल ख़ुश न हुआ ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ से निकल कर
पछताए हम इस शाम-ए-ग़रीबाँ से निकल कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
सियह ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के एवज़ शाने पे चोटी थी
सितारा था मगर दुम-दार था कल शब जहाँ मैं था
बेदिल जौनपूरी
ग़ज़ल
ये रुख़-ए-यार नहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के तले
है निहाँ सुब्ह-ए-वतन शाम-ए-ग़रीबाँ के तले
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
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ग़ज़ल
कर दिया ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ सा परेशाँ मुझ को
दश्त में छोड़ गया है दिल-ए-नादाँ मुझ को
जमीला ख़ुदा बख़्श
ग़ज़ल
शाना तो छुटा ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ से उलझ कर
सुलझा न ये दिल काकुल-ए-पेचाँ से उलझ कर
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
ग़ज़ल
छोड़ मावा-ए-ज़क़न ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ में फँसा
मिस्ल-ए-यूसुफ़ मैं निकल चाह से ज़िंदाँ में फँसा
क़ाएम चाँदपुरी
ग़ज़ल
किस को सौदा तिरा ए ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ होगा
कौन पाबंद-ए-बला-ए-शब-ए-हिज्राँ होगा
अब्दुल मजीद ख़्वाजा शैदा
ग़ज़ल
हुआ है सर में सौदा फिर किसी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ का
न दामन की ख़बर हम को न होश अपने गरेबाँ का
अब्दुल मजीद ख़्वाजा शैदा
नज़्म
अभी उस की ज़रूरत थी
किसी ने निकहत-ए-ज़ुल्फ़-परेशाँ का नहीं पूछा
किसी ने दुख के अंदर रौशनी की छब नहीं देखी
अब्बास ताबिश
ग़ज़ल
ख़ुदा जाने ये क्या तासीर है ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ में
परेशाँ हैं तिरी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ देखने वाले
अख़्तर वाजिदी
नज़्म
रिहाई
शोरिश-ए-दर्द-ओ-ग़म-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की क़सम
चश्म-ए-नम चाक-जिगर दीदा-ए-हैराँ की क़सम