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ग़ज़ल
दिल-ए-वहशत-ज़दा का 'इंतिज़ार' अब तो ये आलम है
कि ख़ुद अपना नशेमन अपने हाथों से जलाता हूँ
इन्तिज़ार ग़ाज़ीपुरी
ग़ज़ल
ज़रा तुम 'इंतिज़ार'-ए-ख़स्ता-जाँ का हौसला देखो
उसे भाता है बारिश में लिबास-ए-काग़ज़ी रखना
इन्तिज़ार ग़ाज़ीपुरी
ग़ज़ल
क्या तुझ को ख़ौफ़ हश्र में पुरशिश का 'इंतिज़ार'
तेरा तो हश्र होगा मुहिब्ब-ए-'अली' के साथ
इन्तिज़ार ग़ाज़ीपुरी
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ग़ज़ल
निशान-ए-ज़ख़्म पे निश्तर-ज़नी जो होने लगी
लहू में ज़ुल्मत-ए-शब उँगलियाँ भिगोने लगी
बद्र-ए-आलम ख़लिश
नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
चराग़ राह में उस के अमल से जलने लगे
लो आज सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार आ ही गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
शब-ए-फ़िराक़ की ज़ुल्मत में ग़म के मारों का
तिरे ख़याल की ताबिंदगी ने साथ दिया