aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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जिसे कहता है ज़माना बुत-ए-बे-महर-ओ-दग़ा-बाज़ जफ़ा-पेशा फ़ुसूँ-साज़ सितम-ख़ाना-बर-अन्दाज़ग़ज़ब जिस का हर इक नाज़ नज़र फ़ित्ना मिज़ा तीर बला ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर ग़म-ओ-रंज का बानी क़लक़-ओ-दर्द
मोहब्बत के लिए कुछ ख़ास दिल मख़्सूस होते हैंये वो नग़्मा है जो हर साज़ पर गाया नहीं जाता
वजूद-ए-ज़न से है तस्वीर-ए-काएनात में रंगइसी के साज़ से है ज़िंदगी का सोज़-ए-दरूँ
मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी हैख़मोशी भी है ये आवाज़ भी है
निगह बुलंद सुख़न दिल-नवाज़ जाँ पुर-सोज़यही है रख़्त-ए-सफ़र मीर-ए-कारवाँ के लिए
दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं हैफिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है
ग़ज़ल उस ने छेड़ी मुझे साज़ देनाज़रा उम्र-ए-रफ़्ता को आवाज़ देना
ये बद-नसीबी नहीं है तो और फिर क्या हैसफ़र अकेले किया हम-सफ़र के होते हुए
बुरा हो आईने तिरा मैं कौन हूँ न खुल सकामुझी को पेश कर दिया गया मिरी मिसाल में
हुई न आम जहाँ में कभी हुकूमत-ए-इश्क़सबब ये है कि मोहब्बत ज़माना-साज़ नहीं
यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता हैकई झूटे इकट्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है
बचपन में हम ही थे या था और कोईवहशत सी होने लगती है यादों से
मिन्नत-ए-चारा-साज़ कौन करेदर्द जब जाँ-नवाज़ हो जाए
छुप गए वो साज़-ए-हस्ती छेड़ करअब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है
दोस्त अहबाब से लेने न सहारे जानादिल जो घबराए समुंदर के किनारे जाना
अल्फ़ाज़ न आवाज़ न हमराज़ न दम-साज़ये कैसे दोराहे पे मैं ख़ामोश खड़ी हूँ
आहों से सोज़-ए-इश्क़ मिटाया न जाएगाफूँकों से ये चराग़ बुझाया न जाएगा
बज़्म से दूर वो गाता रहा तन्हा तन्हासो गया साज़ पे सर रख के सहर से पहले
आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गर्मी कहाँसोज़-ए-ग़म-हा-ए-निहानी और है
सोज़-ए-ग़म दे के मुझे उस ने ये इरशाद कियाजा तुझे कशमकश-ए-दहर से आज़ाद किया
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