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शेर
ये उड़ी उड़ी सी रंगत ये खुले खुले से गेसू
तिरी सुब्ह कह रही है तिरी रात का फ़साना
एहसान दानिश कांधलवी
शेर
ले उड़ी तुझ को निगाह-ए-शौक़ क्या जाने कहाँ
तेरी सूरत पर भी अब तेरा गुमाँ होता नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
अश्कों ने गिर के ख़ाक पे मिट्टी ख़राब की
क्या क्या हँसी उड़ी मिरी चश्म-ए-पुर-आब की