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शेर
असरार-उल-हक़ मजाज़
शेर
आज वाँ तेग़ ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र मेरे क़त्ल करने में वो अब लावेंगे क्या
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
मुझ को ये सोच है जीते हैं वे क्यूँ-कर या-रब
अपने माशूक़ों से जो शख़्स जुदा रहते हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
जुनूँ की चाक-ज़नी ने असर किया वाँ भी
जो ख़त में हाल लिखा था वो ख़त का हाल हुआ