aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "اشک_سرخ"
जो अश्क सुर्ख़ है नामा-निगार है दिल कासुकूत-ए-शब में लिखे जा रहे हैं अफ़्साने
हर अश्क-ए-सुर्ख़ है दामान-ए-शब में आग का फूलबग़ैर शम्अ के भी जल रहे हैं परवाने
इक सिरा उलझी हुई डोर का हाथ आया हैदूसरे तक भी पहुँच जाऊँगा सुलझाते हुए
ज़मीर ओ ज़ेहन में इक सर्द जंग जारी हैकिसे शिकस्त दूँ और किस पे फ़त्ह पाऊँ मैं
इंतिशार-ओ-ख़ौफ़ हर इक सर में हैआफ़ियत से कौन अपने घर में है
इश्क़ सर-ता-ब-क़दम आतिश-ए-सोज़ाँ है मगरउस में शोला न शरारा न धुआँ होता है
बस लहू की बूँद थी एहसास मेंफिर उगाया दश्त ने इक सर नया
दो पाँव हैं जो हार के रुक जाते हैंइक सर है जो दीवार से टकराता है
जब वफ़ा ही नहीं ज़माने मेंइश्क़ सर पर सवार कौन करे
सो अपने हाथ से दीं भी गया है दुनिया भीकि इक सिरे को पकड़ते तो दूसरा जाता
ग़ुस्सा क़ातिल का न बढ़ता है न कम होता हैएक सर है कि वो हर रोज़ क़लम होता है
हम हार तो जाते ही कि दुश्मन के हमारेसौ पैर थे सौ हाथ थे इक सर ही नहीं था
इक दिन वो मिल गए थे सर-ए-रहगुज़र कहींफिर दिल ने बैठने न दिया उम्र भर कहीं
सर पटक कर देखना है एक बार'इश्क़ को पत्थर कहा था 'मीर' ने
सर कटा कर ही सुर्ख़-रूई है'इश्क़ भी कर्बला का मैदाँ है
हर एक काँटे पे सुर्ख़ किरनें हर इक कली में चराग़ रौशनख़याल में मुस्कुराने वाले तिरा तबस्सुम कहाँ नहीं है
एक पत्थर है कि बस सुर्ख़ हुआ जाता हैकोई पहरों से खड़ा है किसी दीवार के पास
हाए ये तवील ओ सर्द रातेंऔर एक हयात-ए-मुख़्तसर में
एक अजीब राग है एक अजीब गुफ़्तुगूसात सुरों की आग है आठवीं सुर की जुस्तुजू
चुनती हैं मेरे अश्क रुतों की भिकारनें'मोहसिन' लुटा रहा हूँ सर-ए-आम चाँदनी
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