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शेर
बे-दीन हुए ईमान दिया हम इश्क़ में सब कुछ खो बैठे
और जिन को समझते थे अपना वो और किसी के हो बैठे
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
शेर
शाम-ए-अवध ने ज़ुल्फ़ में गूँधे नहीं हैं फूल
तेरे बग़ैर सुब्ह-ए-बनारस उदास है
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
शेर
न आए मेरे होंटों तक जो पैमाना नहीं आता
मिरी ख़ुद्दारियों को हाथ फैलाना नहीं आता
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
शेर
मैं कैसे तय करूँ बे-सम्त रास्तों का सफ़र
कहाँ है शहर-ए-तमन्ना कोई पता तो दे
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
शेर
देख लिया क्या जाने शाम की सूनी आँखों में
झील में सूरज अपनी सारी लाली डाल गया
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
शेर
जो छू लूँ आसमाँ पाँव की धरती खींच लेता है
वो मुझ को क्यूँ मिरे क़द से बड़ा होने नहीं देता
राम अवतार गुप्ता मुज़्तर
शेर
ज़रा देखें तो दुनिया कैसे कैसे रंग भरती है
चलो हम अपने अफ़्साने का ग़म उनवान रखते हैं