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शेर
प्यार के बंधन ख़ून के रिश्ते टूट गए ख़्वाबों की तरह
जागती आँखें देख रही थीं क्या क्या कारोबार हुए
बशर नवाज़
शेर
कहते कहते कुछ बदल देता है क्यूँ बातों का रुख़
क्यूँ ख़ुद अपने-आप के भी साथ वो सच्चा नहीं
बशर नवाज़
शेर
जाने किन रिश्तों ने मुझ को बाँध रक्खा है कि मैं
मुद्दतों से आँधियों की ज़द में हूँ बिखरा नहीं
बशर नवाज़
शेर
मसल सच है बशर की क़दर नेमत ब'अद होती है
सुना है आज तक हम को बहुत वो याद करते हैं