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शेर
मैं ने कहा कि बज़्म-ए-नाज़ चाहिए ग़ैर से तिही
सुन के सितम-ज़रीफ़ ने मुझ को उठा दिया कि यूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
नज़ीर अकबराबादी
शेर
चाह की चितवन मेरी आँख उस की शरमाई हुई
ताड़ ली मज्लिस में सब ने सख़्त रुस्वाई हुई