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शेर
अगर कुछ रोज़ ज़िंदा रह के मर जाना मुक़द्दर है
तो इस दुनिया में आख़िर बाइस-ए-तख़्लीक़-ए-जाँ क्या था
जगत मोहन लाल रवाँ
शेर
यही हस्ती इसी हस्ती के कुछ टूटे हुए रिश्ते
वगरना ऐसा पर्दा मेरे उन के दरमियाँ क्या था
जगत मोहन लाल रवाँ
शेर
अभी तक फ़स्ल-ए-गुल में इक सदा-ए-दर्द आती है
वहाँ की ख़ाक से पहले जहाँ था आशियाँ मेरा
जगत मोहन लाल रवाँ
शेर
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
हम ने सीने से लगाया दिल न अपना बन सका
मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया