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शेर
तिलिस्म-ए-ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा ओ दाम-ए-बर्दा-फ़रोश
हज़ार तरह के क़िस्से सफ़र में होते हैं
अज़ीज़ हामिद मदनी
शेर
हमेशा ख़ून-ए-दिल रोया हूँ मैं लेकिन सलीक़े से
न क़तरा आस्तीं पर है न धब्बा जैब ओ दामन पर
साइल देहलवी
शेर
किश्वर-ए-दिल अब मकान-ए-दर्द-ओ-दाग़-ओ-यास है
इश्क़ के हाकिम ने बिठलाए हैं याँ थाने कई