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शेर
जो सारा दिन मिरे ख़्वाबों को रेज़ा रेज़ा करते हैं
मैं उन लम्हों को सी कर रात का बिस्तर बनाती हूँ
सरवत ज़ेहरा
शेर
पुराने ख़्वाबों से रेज़ा रेज़ा बदन हुआ है
ये चाहता हूँ कि अब नया कोई ख़्वाब देखूँ
अख़्तर होशियारपुरी
शेर
एक मुकम्मल वाहिद हस्ती मेरी मालिक फिर काहे को
किरची किरची रेज़ा रेज़ा पारा-पारा मैं आवारा
अहमद वक़ास महरवी
शेर
ज़िंदगी-ए-दो-रोज़ा से करते हैं वज़्अ जन्नतें
हम को बहुत है ये जहाँ जन्नत-ए-जावेदाँ न दे
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
तुम्हारे वस्ल का जिस दिन कोई इम्कान होता है
मैं उस दिन रोज़ा रखता हूँ बुराई छोड़ देता हूँ
अहमद कमाल परवाज़ी
शेर
हैं वजूद-ए-शय में पिन्हाँ अज़ल ओ अबद के रिश्ते
यहाँ कुछ नहीं दो रोज़ा कोई शय नहीं है फ़ानी
अली जवाद ज़ैदी
शेर
दिल में ख़ाक उड़ती है कहने को बड़े हैं ज़ाहिद
मक्र का विर्द है पढ़ते हैं रिया की तस्बीह