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शेर
वतन की ख़ाक से मर कर भी हम को उन्स बाक़ी है
मज़ा दामान-ए-मादर का है इस मिट्टी के दामन में
चकबस्त बृज नारायण
शेर
सारी गली सुनसान पड़ी थी बाद-ए-फ़ना के पहरे में
हिज्र के दालान और आँगन में बस इक साया ज़िंदा था
जौन एलिया
शेर
ख़ुदा जाने दुआ थी या शिकायत लब पे बिस्मिल के
नज़र सू-ए-फ़लक थी हाथ में दामान-ए-क़ातिल था
आनंद नारायण मुल्ला
शेर
गए हैं यार अपने अपने घर दालान ख़ाली है
अगर तुम आ मिलो ऐसे में तो मैदान ख़ाली है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
समझता हूँ वसीला मग़फ़िरत का शर्म-ए-इस्याँ को
कि अश्कों से मिरे धुल जाएगा दामान-ए-तर मेरा