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शेर
सफ़-ए-मुनाफ़िक़ाँ में फिर वो जा मिला तो क्या अजब
हुई थी सुल्ह भी ख़मोश इख़्तिलाफ़ की तरह
मुसव्विर सब्ज़वारी
शेर
अजीब उस से तअ'ल्लुक़ है क्या कहा जाए
कुछ ऐसी सुल्ह नहीं है कुछ ऐसी जंग नहीं
अकबर अली खान अर्शी जादह
शेर
फिर वही हम थे वही तुम थे मोहब्बत थे वही
सुल्ह कर लेते अगर आँखें लड़ाने के लिए
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
शेर
सुल्ह-ए-कुल में मिरी गुज़रे है मोहब्बत के बीच
न तो तकरार है काफ़िर से न दीं-दार से बहस
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
हम-दिगर मोमिन को है हर बज़्म में तकफ़ीर-ए-जंग
नेक सुल्ह-ए-कुल है बद है बा-जवान-ओ-पीर-ए-जंग
वलीउल्लाह मुहिब
शेर
बीच में है मेरे उस के तू ही ऐ आह-ए-हज़ीं
सुल्ह क्यूँकर होवे जब तक दरमियाँ कोई न हो