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शेर
रखते हैं हुस्न-ए-ज़न ये बुतों की वफ़ा से हम
जैसे कि माँगते हैं दुआएँ ख़ुदा से हम
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
शेर
नियाज़-ए-बे-ख़ुदी बेहतर नमाज़-ए-ख़ुद-नुमाई सीं
न कर हम पुख़्ता-मग़्ज़ों सीं ख़याल-ए-ख़ाम ऐ वाइ'ज़
सिराज औरंगाबादी
शेर
बड़ा दिलचस्प और राहत भरा था ये सफ़र अपना
चलो अब अपनी अपनी राह चलते हैं ख़ुदा-हाफ़िज़
गुलज़ार मुरादाबादी
शेर
अनार-ए-ख़ुल्द को तू रख कि मैं पसंद नहीं
कुचें वो यार की रश्क-ए-अनार ऐ वाइ'ज़
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
शेर
सरीर-ए-सल्तनत से आस्तान-ए-यार बेहतर था
हमें ज़िल्ल-ए-हुमा से साया-ए-दीवार बेहतर था
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
शेर
'अर्ज़ी इंसाफ़ की हम ने भी लगा रक्खी है
देखिए ज़िल्ल-ए-इलाही हमें कब पूछते हैं