aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "لاجوردی"
चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकलेआशिक़ का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले
चीन ओ अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारारहने को घर नहीं है सारा जहाँ हमारा
मुर्ग़ियाँ कोफ़ते मछली भुने तीतर अंडेकिस के घर जाएगा सैलाब-ए-ग़िज़ा मेरे बाद
लीडरी में भला हुआ उन काबंदगी में मिरा भला न हुआ
कफ़न की क़ीमत सुनेंगे मुर्दे तो इस के सदमे से जी उठेंगेजनाज़ा उट्ठेगा अब किसी का न अब किसी का मज़ार होगा
जहाँ रहती थी ''ज़ोहरा-जान'' कभीपीर-साहिब का आस्ताना हुआ
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