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शेर
पुराने साल की ठिठुरी हुई परछाइयाँ सिमटीं
नए दिन का नया सूरज उफ़ुक़ पर उठता आता है
अली सरदार जाफ़री
शेर
क्यूँ बंद सब खुले हैं क्यूँ चीरा लट पटा है
क्या क़त्ल कूँ हमारे अब ठाठ यूँ ठठा है