aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "अक़रब"
लम्हा लम्हा रोज़ सँवरने वाला तूलम्हा लम्हा लम्हा रोज़ बिखरने वाला मैं
मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ सेमेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
जियूँगा मैं तिरी साँसों में जब तकख़ुद अपनी साँस में ज़िंदा रहूँगा
वही क़ातिल वही शाहिद वही मुंसिफ़ ठहरेअक़रबा मेरे करें क़त्ल का दावा किस पर
चीन ओ अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारारहने को घर नहीं है सारा जहाँ हमारा
पाँव उठते हैं किसी मौज की जानिब लेकिनरोक लेता है किनारा कि ठहर पानी है
ऐ ख़ाक-ए-वतन अब तो वफ़ाओं का सिला देमैं टूटती साँसों की फ़सीलों पे खड़ा हूँ
अब दिल भी दुखाओ तो अज़िय्यत नहीं होतीहैरत है किसी बात पे हैरत नहीं होती
मुस्कुराने की सज़ा मिलती रहीमुस्कुराने की ख़ता करते रहे
सितारा आँख में दिल में गुलाब क्या रखनाकि ढलती उम्र में रंग-ए-शबाब क्या रखना
मयस्सर से ज़ियादा चाहता हैसमुंदर जैसे दरिया चाहता है
दो चार बरस जितने भी हैं जब्र ही सह लेंइस उम्र में अब हम से बग़ावत नहीं होती
कुछ तो इनायतें हैं मिरे कारसाज़ कीऔर कुछ मिरे मिज़ाज ने तन्हा किया मुझे
इश्क़ इक ऐसी हवेली है कि जिस से बाहरकोई दरवाज़ा खुले और न दरीचा निकले
अंधा सफ़र है ज़ीस्त किसे छोड़ दे कहाँउलझा हुआ सा ख़्वाब है ताबीर क्या करें
कैसे उस को दिल की हालत समझाऊँबात करूँ तो आँख चुराने लगता है
कितना मुश्किल हुआ जवाब मुझेकितना आसान था सवाल उस का
बस इतना याद है इक भूल सी हुई थी कहींअब इस से बढ़ के दुखों का हिसाब क्या रखना
अब दर्द भी इक हद से गुज़रने नहीं पाताअब हिज्र में वो पहली सी वहशत नहीं होती
मैं हाथों में ख़ंजर ले कर सोच रहा हूँलौटूँगा तो मेरा भी घर ज़ख़्मी होगा
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