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शेर
किया है फ़ाश पर्दा कुफ़्र-ओ-दीं का इस क़दर मैं ने
कि दुश्मन है बरहमन और अदू शैख़-ए-हरम मेरा
चकबस्त बृज नारायण
शेर
मैं कुफ़्र ओ दीं से गुज़र कर हुआ हूँ ला-मज़हब
ख़ुदा-परस्त से मतलब न बुत-परस्त से काम
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
शेर
सर-रिश्ता कुफ़्र-ओ-दीं का हक़ीक़त में एक है
जो तार-ए-सुब्हा है सो है ज़ुन्नार देखना
मिर्ज़ा जवाँ बख़्त जहाँदार
शेर
यही तो कुफ़्र है यारान-ए-बे-ख़ुदी के हुज़ूर
जो कुफ़्र-ओ-दीं का मिरे यार इम्तियाज़ रहा
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
शेर
दिखा दी मैं ने वो मंज़िल जो इन दोनों के आगे है
परेशाँ हैं कि आख़िर अब कहें क्या कुफ़्र ओ दीं मुझ से
अली जवाद ज़ैदी
शेर
तिरी महफ़िल में फ़र्क़-ए-कुफ़्र-ओ-ईमाँ कौन देखेगा
फ़साना ही नहीं कोई तो उनवाँ कौन देखेगा
अज़ीज़ वारसी
शेर
कुफ्र-ओ-इस्लाम के झगड़ों से छुड़ाया सद-शुक्र
क़ैद-ए-मज़हब से जुनूँ ने मुझे आज़ाद किया
असद अली ख़ान क़लक़
शेर
कुफ्र-ओ-इस्लाम में तौलें जो हक़ीक़त तेरी
बुत-कदा क्या कि हरम संग-ए-तराज़ू हो जाए
मुनीर शिकोहाबादी
शेर
दयार-ए-इश्क़ आया कुफ़्र-ओ-ईमाँ की हदें छूटीं
यहीं से और पैदा कर ख़ुदा ओ अहरमन कोई
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
कुफ़्र-ओ-ईमाँ से है क्या बहस इक तमन्ना चाहिए
हाथ में तस्बीह हो या दोश पर ज़ुन्नार हो