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शेर
मैं दे रहा हूँ तुझे ख़ुद से इख़्तिलाफ़ का हक़
ये इख़्तिलाफ़ का हक़ है मुख़ालिफ़त का नहीं
सनाउल्लाह ज़हीर
शेर
हमारी ज़िंदगी क्या है मोहब्बत ही मोहब्बत है
तुम्हारा भी यही दस्तूर बन जाए तो अच्छा हो