aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "पत-झड़"
साँस लेता हूँ कि पत-झड़ सी लगी है मुझ मेंवक़्त से टूट रहे हैं मिरे बँधन जैसे
वहीं पे झाड़ के उठते हैं फिर मता’-ए-हयातकि ज़िंदगी को जहाँ जिस के नाम करते हैं
जो फूल झड़ गए थे जो आँसू बिखर गएख़ाक-ए-चमन से उन का पता पूछता रहा
अब्र-ए-नैसाँ की भी झड़ जाएगी पल में शेख़ीदीदा-ए-तर को अगर अश्क-फ़िशाँ कीजिएगा
अज़ल से मेरी हिफ़ाज़त का फ़र्ज़ है उन परसभी दुखों को मेरे आस-पास होना है
तुम्हारी गुफ़्तुगू से भी अज़ीज़ है मुझ कोअकेले बैठना और ख़ुद पे तब्सिरा करना
इक पल में झड़ी अब्र-ए-तुनक-माया की शेख़ीदेखा जो मिरा दीदा-ए-पुर-आब न ठहरा
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