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शेर
शाम ने बर्फ़ पहन रक्खी थी रौशनियाँ भी ठंडी थीं
मैं इस ठंडक से घबरा कर अपनी आग में जलने लगा
शमीम हनफ़ी
शेर
कहीं जैसे मैं कोई चीज़ रख कर भूल जाता हूँ
पहन लेता हूँ जब दस्तार तो सर भूल जाता हूँ
भारत भूषण पन्त
शेर
माथे पे लगा संदल वो हार पहन निकले
हम खींच वहीं क़श्क़ा ज़ुन्नार पहन निकले
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
शेर
पहन लो ऐ बुतो ज़ुन्नार-ए-तस्बीह-ए-सुलैमानी
रखो राज़ी इसी पर्दे में हर शैख़-ओ-बरहमन को