aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "बिसरते"
ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैंफिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं
दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल मेंइक आईना था टूट गया देख-भाल में
आज फिर नींद को आँखों से बिछड़ते देखाआज फिर याद कोई चोट पुरानी आई
अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोईऔर बिखर जाऊँ तो मुझ को न समेटे कोई
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती हैउन की आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं
इक रात चाँदनी मिरे बिस्तर पे आई थीमैं ने तराश कर तिरा चेहरा बना दिया
जम्अ करते रहे जो अपने को ज़र्रा ज़र्रावो ये क्या जानें बिखरने में सुकूँ कितना है
बिखरे हुए थे लोग ख़ुद अपने वजूद मेंइंसाँ की ज़िंदगी का अजब बंदोबस्त था
मैं बिस्तर-ए-ख़याल पे लेटा हूँ उस के पाससुब्ह-ए-अज़ल से कोई तक़ाज़ा किए बग़ैर
वो बात सोच के मैं जिस को मुद्दतों जीताबिछड़ते वक़्त बताने की क्या ज़रूरत थी
जब बिगड़ते हैं बात बात पे वोवस्ल के दिन क़रीब होते हैं
ग़म है तो कोई लुत्फ़ नहीं बिस्तर-ए-गुल परजी ख़ुश है तो काँटों पे भी आराम बहुत है
बिखरे हुए ख़्वाबों की वो तस्वीर है शायदअब ये भी नहीं याद कहाँ उस से मिला था
मिरे पड़ोस में ऐसे भी लोग बसते हैंजो मुझ में ढूँड रहे हैं बुराइयाँ अपनी
उस से बिछड़ते वक़्त मैं रोया था ख़ूब-साये बात याद आई तो पहरों हँसा किया
तू मुझे बनते बिगड़ते हुए अब ग़ौर से देखवक़्त कल चाक पे रहने दे न रहने दे मुझे
लम्हा लम्हा रोज़ सँवरने वाला तूलम्हा लम्हा लम्हा रोज़ बिखरने वाला मैं
जम्अ करती है मुझे रात बहुत मुश्किल सेसुब्ह को घर से निकलते ही बिखरने के लिए
रोज़ बस्ते हैं कई शहर नएरोज़ धरती में समा जाते हैं
मोहब्बत के घरों के कच्चे-पन को ये कहाँ समझेंइन आँखों को तो बस आता है बरसातें बड़ी करना
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