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शेर
दीवार के उस पार जाने की तमन्ना है तो फिर
हिम्मत जुटा कर तुम कभी दीवार ढाते क्यों नहीं
राघवेंद्र द्विवेदी
शेर
दिल के अज्ज़ा में नहीं मिलता कोई जुज़्व-ए-निशात
इस सहीफ़े से किसी ने इक वरक़ कम कर दिया
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
शेर
तिरे जुज़्व जुज़्व ख़याल को रग-ए-जाँ में पूरा उतार कर
वो जो बार बार की शक्ल थी उसे एक बार बना दिया
इक़बाल कौसर
शेर
मैं भी था हाज़िर बज़्म में जब तू ने देखा ही नहीं
मैं भी उठा कर चल दिया बिल्कुल नया जूता तिरा
दिलावर फ़िगार
शेर
लड़के की अमाँ ये बोलीं काम करे उस की जूती
दो भाई भत्ता लेते हैं अब्बा ख़ैर से डाकू हैं
अतहर शाह ख़ान जैदी
शेर
पड़ें जूते हज़ारों सर पे लेकिन मैं न निकलूँगा
तेरे कूचे के हम-सर बाग़-ए-रिज़वाँ हो नहीं सकता
बूम मेरठी
शेर
उन में इक तगड़ा सा जूता एक डी.एस.पी का था
उम्र भर जो बे-गुनाहों के सरों पर था चला