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शेर
दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक
मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर
पर्बत सहरा नदियाँ जंगल हमराज़ तिरे होना चाहें
ख़ामोश परिंदे अब तो निकल दुख को सरगम करने के लिए
प्रियंवदा इल्हान
शेर
ख़ुदाया आज के शौहर हैं या मासूम बच्चे हैं
ज़रा सा घूर ले बीवी तो झट ये सहम जाते हैं
राजा मेहदी अली ख़ाँ
शेर
कहो हुस्न-ए-जमाल-यार से ये इतनी सज-धज क्यों
भरी बरसात में पौदों को पानी कौन देता है
अज़हर बख़्श अज़हर
शेर
मेरी सज-धज तो कोई इश्क़-ए-बुताँ में देखे
साथ क़श्क़े के है ज़ुन्नार-ए-बरहमन कैसा
रियाज़ ख़ैराबादी
शेर
मैं तिश्ना-लबी पर भी रहा ख़ुश कि मिरा ज़र्फ़
ख़ाली है मगर सोच से लोगों की बड़ा है
सद्दाम हुसैन मुज़मर
शेर
फूल लगते हैं ज़रा देर से अव्वल अव्वल
शाख़-ए-गुल पर भी मियाँ ख़ार ही लगते हैं ना