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शेर
रुस्वा अगर न करना था आलम में यूँ मुझे
ऐसी निगाह-ए-नाज़ से देखा था क्यूँ मुझे
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
शेर
इब्न-ए-इंशा
शेर
तमीज़-ए-ख़्वाब-ओ-हक़ीक़त है शर्त-ए-बेदारी
ख़याल-ए-अज़्मत-ए-माज़ी को छोड़ हाल को देख
सिकंदर अली वज्द
शेर
हैं यादगार-ए-आलम-ए-फ़ानी ये दोनों चीज़
उस की जफ़ा और अपनी वफ़ा लिख रखेंगे हम
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
कभी हो सका तो बताऊँगा तुझे राज़-ए-आलम-ए-ख़ैर-ओ-शर
कि मैं रह चुका हूँ शुरूअ' से गहे ऐज़्द-ओ-गहे अहरमन