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शेर
इब्न-ए-इंशा
शेर
दुआएँ माँगी हैं साक़ी ने खोल कर ज़ुल्फ़ें
बसान-ए-दस्त-ए-करम अब्र-ए-दजला-बार बरस
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
शेर
मज़ा बरसात का चाहो तो इन आँखों में आ बैठो
स्याही है सफ़ेदी है शफ़क़ है अब्र-ए-बाराँ है