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शेर
आँखों में अश्क दाग़ जिगर में लबों पे आह
सब कुछ है पास बे-सर-ओ-सामाँ नहीं हैं हम
अब्र अहसनी गुन्नौरी
शेर
ऐ मुक़ल्लिद बुल-हवस हम से न कर दावा-ए-इश्क़
दाग़ लाला की तरह रखते हैं मादर-ज़ाद हम
इश्क़ औरंगाबादी
शेर
देखने वाले ये कहते हैं किताब-ए-दहर में
तू सरापा हुस्न का नक़्शा है मैं तस्वीर-ए-इश्क़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
इब्न-ए-इंशा
शेर
सुना किस ने हाल मेरा कि जूँ अब्र वो न रोया
रखे है मगर ये क़िस्सा असर-ए-दुआ-ए-बाराँ
बन्द्र इब्न-ए-राक़िम
शेर
अश्क के अब्र-ए-रवाँ में ढूँढती हूँ मैं तुझे
आस की इन तितलियों को भी ठिकाना चाहिए
बहारुन्निसा बहार
शेर
पहली सी लज़्ज़तें नहीं अब दर्द-ए-इश्क़ में
क्यूँ दिल को मैं ने ज़ुल्म का ख़ूगर बना दिया
सेहर इश्क़ाबादी
शेर
दुआएँ माँगी हैं साक़ी ने खोल कर ज़ुल्फ़ें
बसान-ए-दस्त-ए-करम अब्र-ए-दजला-बार बरस