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शेर
इश्क़ के दर्द का ख़ुद इश्क़ को एहसास नहीं
खिंच गया बादे से भी दुर्द-ए-तह-ए-जाम बहुत
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
अख़तर मुस्लिमी
शेर
गुल खिलाए न कहीं फ़ित्ना-ए-दौराँ कुछ और
आज-कल दौर-ए-मय-ओ-जाम से जी डरता है
अख़्तर अंसारी अकबराबादी
शेर
आग़ाज़-ए-मोहब्बत से अंजाम-ए-मोहब्बत तक
गुज़रा है जो कुछ हम पर तुम ने भी सुना होगा