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शेर
इसी बाइस मैं अपना निस्फ़ रखता हूँ अँधेरे में
मिरे अतराफ़ भी सूरज कोई गर्दिश में रहता है
अरशद जमाल सारिम
शेर
तवज्जोह चारा-गर की बाइस-ए-तकलीफ़ है 'बेख़ुद'
इज़ाफ़ा है मुसीबत में दवाओं का असर करना
अब्बास अली ख़ान बेखुद
शेर
गुल-ओ-गुलचीं का गिला बुलबुल-ए-ख़ुश-लहजा न कर
तू गिरफ़्तार हुई अपनी सदा के बाइ'स
अल्ताफ़ हुसैन हाली
शेर
यही आदत तो है 'सादी' सुकून-ए-क़ल्ब का बाइस
मैं नफ़रत भूल जाता हूँ मोहब्बत बाँट देता हूँ
सईद इक़बाल सादी
शेर
अगर कुछ रोज़ ज़िंदा रह के मर जाना मुक़द्दर है
तो इस दुनिया में आख़िर बाइस-ए-तख़्लीक़-ए-जाँ क्या था
जगत मोहन लाल रवाँ
शेर
न दुनिया बाइ'स-ए-ग़फ़लत न उक़्बा वज्ह-ए-हुश्यारी
रहे जो तुझ से ग़ाफ़िल हम उसे ग़ाफ़िल समझते हैं
अमजद नजमी
शेर
गर रहूँ शहर में हो दूद के बाइस ख़फ़क़ाँ
जाऊँ सहरा को तो दम गर्द-ए-बयाबाँ रोके