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शेर
बाद-ए-नफ़रत फिर मोहब्बत को ज़बाँ दरकार है
फिर अज़ीज़-ए-जाँ वही उर्दू ज़बाँ होने लगी
मुहम्मद याक़ूब आमिर
शेर
मुझे जब मार ही डाला तो अब दोनों बराबर हैं
उड़ाओ ख़ाक सरसर बन के या बाद-ए-सबा बन कर
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
बद-क़िस्मतों को गर हो मयस्सर शब-ए-विसाल
सूरज ग़ुरूब होते ही ज़ाहिर हो नूर-ए-सुब्ह
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
मर चुका मैं तो नहीं इस से मुझे कुछ हासिल
बरसे गिर पानी की जा आब-ए-बक़ा मेरे बा'द
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
बादबानों में भरी है इस के क्या बाद-ए-नफ़स
कश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँ को ताब लंगर की नहीं
दत्तात्रिया कैफ़ी
शेर
बाद-ए-शब-ए-विसाल न देखूँ मैं दाग़-ए-हिज्र
या-रब चराग़-ए-उम्र बुझा दे हवा-ए-सुब्ह
लाला माधव राम जौहर
शेर
गलियों गलियों शहरों शहरों किस ने आग लगाई है
बुग़्ज़-ओ-नफ़रत का दुनिया को किस ने ये माहौल दिया
सलीम सिद्दीक़ी
शेर
तुंदी-ए-बाद-ए-मुख़ालिफ़ से न घबरा ऐ उक़ाब
ये तो चलती है तुझे ऊँचा उड़ाने के लिए
सय्यद सादिक़ हुसैन
शेर
न छेड़ ऐ निकहत-ए-बाद-ए-बहारी राह लग अपनी
तुझे अटखेलियाँ सूझी हैं हम बे-ज़ार बैठे हैं