aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bachaa.e.n"
इक आग ग़म-ए-तन्हाई की जो सारे बदन में फैल गईजब जिस्म ही सारा जलता हो फिर दामन-ए-दिल को बचाएँ क्या
नफ़रत के ख़ज़ाने में तो कुछ भी नहीं बाक़ीथोड़ा सा गुज़ारे के लिए प्यार बचाएँ
बचाएँ आबरू जिस्मों की भीड़ में कैसेहै खोलनी गिरह-ए-जाँ मगर कहाँ खोलें
पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन हैकोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा मेंफिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते
अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हमये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम
ख़ुदा बचाए तिरी मस्त मस्त आँखों सेफ़रिश्ता हो तो बहक जाए आदमी क्या है
बेचैन इस क़दर था कि सोया न रात भरपलकों से लिख रहा था तिरा नाम चाँद पर
ये कह के दिल ने मिरे हौसले बढ़ाए हैंग़मों की धूप के आगे ख़ुशी के साए हैं
उसे बेचैन कर जाऊँगा मैं भीख़मोशी से गुज़र जाऊँगा मैं भी
एक औरत से वफ़ा करने का ये तोहफ़ा मिलाजाने कितनी औरतों की बद-दुआएँ साथ हैं
मेरा बचपन भी साथ ले आयागाँव से जब भी आ गया कोई
दुआएँ याद करा दी गई थीं बचपन मेंसो ज़ख़्म खाते रहे और दुआ दिए गए हम
हम तो बचपन में भी अकेले थेसिर्फ़ दिल की गली में खेले थे
फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खाकभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया उधर रक्खा
इक चुभन है कि जो बेचैन किए रहती हैऐसा लगता है कि कुछ टूट गया है मुझ में
असीर-ए-पंजा-ए-अहद-ए-शबाब कर के मुझेकहाँ गया मिरा बचपन ख़राब कर के मुझे
बढ़ते चले गए जो वो मंज़िल को पा गएमैं पत्थरों से पाँव बचाने में रह गया
ख़ुद को इतना भी मत बचाया करबारिशें हों तो भीग जाया कर
ज़ख़्म ही तेरा मुक़द्दर हैं दिल तुझ को कौन सँभालेगाऐ मेरे बचपन के साथी मेरे साथ ही मर जाना
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