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शेर
ऐ बाग़बाँ नहीं तिरे गुलशन से कुछ ग़रज़
मुझ से क़सम ले छेड़ूँ अगर बर्ग-ओ-बर कहीं
बन्द्र इब्न-ए-राक़िम
शेर
वो सहरा जिस में कट जाते हैं दिन याद-ए-बहाराँ से
ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर उस को चमन कहना ही पड़ता है
अर्श मलसियानी
शेर
जिस्म-ए-ख़ाकी को बनाया लाग़री ने ऐन-रूह
ग़र्क़-ए-आब-ए-बहर कट कट कर ये साहिल हो गया