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शेर
दिल चटख़ जाता है मेरा देखता हूँ ख़ुद को जब
बरसर-ए-पैकार शीशे में खड़े इक शख़्स से
सय्यद कामरान ज़ुबैर कामी
शेर
मैं जिन गलियों में पैहम बरसर-ए-गर्दिश रहा हूँ
मैं उन गलियों में इतना ख़ार पहले कब हुआ था
तहसीन फ़िराक़ी
शेर
बर-सर-ए-आम इक़रार अगर ना-मुम्किन है तो यूँही सही
कम-अज़-कम इदराक तो कर ले गुन बे-शक मत मान मिरे
कौसर नियाज़ी
शेर
मैं अज़ल से सुब्ह-ए-महशर तक फ़रोज़ाँ ही रहा
हुस्न समझा था चराग़-ए-कुश्ता-ए-महफ़िल मुझे
जिगर मुरादाबादी
शेर
दस्त-ए-शिकस्ता अपना न पहुँचा कभी दरेग़
वाँ तर्फ़-ए-दोश बर-सर-ए-दस्तार ही रहा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
सुब्ह तक वो भी न छोड़ी तू ने ऐ बाद-ए-सबा
यादगार-ए-रौनक़-ए-महफ़िल थी परवाने की ख़ाक
आसी ग़ाज़ीपुरी
शेर
दिल का कँवल बुझे हुए मुद्दत गुज़र गई
अब ये चराग़ लाएक़-ए-महफ़िल नहीं रहा