aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "basrii"
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होनाआदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गएइंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए
दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली हैजो भी गुज़रा है उस ने लूटा है
अनोखी वज़्अ' है सारे ज़माने से निराले हैंये आशिक़ कौन सी बस्ती के या-रब रहने वाले हैं
खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिएसवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझ को
ऐसी तारीकियाँ आँखों में बसी हैं कि 'फ़राज़'रात तो रात है हम दिन को जलाते हैं चराग़
अब याद-ए-रफ़्तगाँ की भी हिम्मत नहीं रहीयारों ने कितनी दूर बसाई हैं बस्तियाँ
नाला-ए-बुलबुल-ए-शैदा तो सुना हँस हँस करअब जिगर थाम के बैठो मिरी बारी आई
दिल की बस्ती अजीब बस्ती हैये उजड़ने के बा'द बस्ती है
एक बोसा होंट पर फैला तबस्सुम बन गयाजो हरारत थी मिरी उस के बदन में आ गई
इस लिए चल न सका कोई भी ख़ंजर मुझ परमेरी शह-रग पे मिरी माँ की दुआ रक्खी थी
बाहर बाहर सन्नाटा है अंदर अंदर शोर बहुतदिल की घनी बस्ती में यारो आन बसे हैं चोर बहुत
आबादी भी देखी है वीराने भी देखे हैंजो उजड़े और फिर न बसे दिल वो निराली बस्ती है
दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सकेपछताओगे सुनो हो ये बस्ती उजाड़ कर
गाँव की आँख से बस्ती की नज़र से देखाएक ही रंग है दुनिया को जिधर से देखा
वो इत्र-दान सा लहजा मिरे बुज़ुर्गों कारची-बसी हुई उर्दू ज़बान की ख़ुश्बू
अपने दिए को चाँद बताने के वास्तेबस्ती का हर चराग़ बुझाना पड़ा हमें
दिल तो पहले ही जुदा थे यहाँ बस्ती वालोक्या क़यामत है कि अब हाथ मिलाने से गए
ऊँचे नीचे घर थे बस्ती में बहुतज़लज़ले ने सब बराबर कर दिए
फिर उस गली से अपना गुज़र चाहता है दिलअब उस गली को कौन सी बस्ती से लाऊँ मैं
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