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शेर
बला-ए-जाँ थी जो बज़्म-ए-तमाशा छोड़ दी मैं ने
ख़ुशा ऐ ज़िंदगी ख़्वाबों की दुनिया छोड़ दी मैं ने
अबु मोहम्मद सहर
शेर
दो-शाला शाल कश्मीरी अमीरों को मुबारक हो
गलीम-ए-कोहना में जाड़ा फ़क़ीरों का बसर होगा
आग़ा अकबराबादी
शेर
बाम-ए-फ़लक पे गर वो उड़ाता नहीं पतंग
ख़ुर्शीद ओ माह डोर के फिर किस की गोले हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
सहर के साथ होगा चाक मेरा दामन-ए-हस्ती
ब-रंग-ए-शम्अ बज़्म-ए-दहर में मेहमाँ हूँ शब भर का
ताैफ़ीक़ हैदराबादी
शेर
है रोज़-ए-पंज-शम्बा तू फ़ातिहा दिला दे
घर तेरे कुश्तगाँ की रूहें न आइयाँ हों
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ भी थी परवाना भी
रात के आख़िर होते होते ख़त्म था ये अफ़्साना भी