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शेर
एक मैं हूँ कि इस आशोब-ए-नवा में चुप हूँ
वर्ना दुनिया मिरे ज़ख़्मों की ज़बाँ बोलती है
इरफ़ान सिद्दीक़ी
शेर
हम पे जो गुज़री है बस उस को रक़म करते हैं
आप-बीती कहो या मर्सिया-ख़्वानी कह लो
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
शेर
क्या तुम्हें अहद-ए-मोहब्बत के वो लम्हे याद हैं
जब निगाहें बोलती थीं और हम ख़ामोश थे
उम्मतुर्रऊफ़ नसरीन
शेर
कोई मौसम मेरी उम्मीदों को रास आया नहीं
फ़स्ल अँधियारों की काटी और दिए बोती रही