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शेर
गो कि हम सफ़्हा-ए-हस्ती पे थे एक हर्फ़-ए-ग़लत
लेकिन उठ्ठे भी तो इक नक़्श बिठा कर उठे
मोमिन ख़ाँ मोमिन
शेर
मक़्सद-ए-ज़ीस्त ग़म-ए-इश्क़ है सहरा हो कि शहर
बैठ जाएँगे जहाँ चाहो बिठा दो हम को
एहसान दानिश कांधलवी
शेर
क़ासिद जो गया मेरा ले नामा तो ज़ालिम ने
नामे के किए पुर्ज़े क़ासिद को बिठा रक्खा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
अक़्ल-ए-इंसाँ ने बिठा रक्खे हैं पहरे दिल पर
दिल की क्या बात कहेगा जो न दीवाना बने