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शेर
हुजूम-ए-अब्र है चमके है बर्क़ और मेंह बरसता है
नशा है ताज़गी है यार है क्या क्या बहारें हैं
नज़ीर अकबराबादी
शेर
मियाँ ये चादर-ए-शोहरत तुम अपने पास रखो
कि इस से पाँव जो ढाँपें तो सर निकलता है