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शेर
मुंतज़िर तेरे हैं चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ खोले हुए
बैठे हैं दिल बेचने वाले दुकाँ खोले हुए
तअशशुक़ लखनवी
शेर
'नसीर' अब हम को क्या है क़िस्सा-ए-कौनैन से मतलब
कि चश्म-ए-पुर-फुसून-ए-यार का अफ़्साना रखते हैं
शाह नसीर
शेर
नाज़ उधर दिल को उड़ा लेने की घातों में रहा
मैं इधर चश्म-ए-सुख़न-गो तिरी बातों में रहा
नातिक़ गुलावठी
शेर
हुस्न के जल्वे नहीं मुहताज-ए-चश्म-ए-आरज़ू
शम्अ जलती है इजाज़त ले के परवाने से क्या
आनंद नारायण मुल्ला
शेर
जो चश्म-ए-दिल-रुबा के वस्फ़ में अशआ'र लिखता हूँ
तो हर हर लफ़्ज़ पर अहल-ए-नज़र इक साद करते हैं
दत्तात्रिया कैफ़ी
शेर
चश्म-ए-लैला का जो आलम है उन्हों की चश्म में
देखे है दो दो पहर मजनूँ ग़ज़ालाँ की तरफ़