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शेर
सिया है ज़ख़्म-ए-बुलबुल गुल ने ख़ार और बू-ए-गुलशन से
सूई तागा हमारे चाक-ए-दिल का है कहाँ देखें
वली उज़लत
शेर
कुछ हँसी खेल सँभलना ग़म-ए-हिज्राँ में नहीं
चाक-ए-दिल में है मिरे जो कि गरेबाँ में नहीं
अल्ताफ़ हुसैन हाली
शेर
रफ़ू फिर कीजियो पैराहन-ए-यूसुफ़ को ऐ ख़य्यात
सिया जाए तो सी पहले तू चाक-ए-दिल ज़ुलेख़ा का
रज़ा अज़ीमाबादी
शेर
होश में लाने की तदबीर न कर ऐ नासेह
मैं ने पाया है उन्हें चाक-ए-गरेबाँ हो कर
अबु मोहम्मद वासिल बहराईची
शेर
मुझे चाक-ए-गरेबाँ पर हँसी आई तो है लेकिन
मिरे हँसने पे उन की आँख भरी आई तो क्या होगा
कैफ़ी बिलग्रामी
शेर
गरेबाँ चाक है हाथों में ज़ालिम तेरा दामाँ है
कि इस दामन तलक ही मंज़िल-ए-चाक-ए-गरेबाँ है
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
शेर
मिरा चाक-ए-गिरेबाँ चाक-ए-दिल से मिलने वाला है
मगर ये हादसे भी बेश ओ कम होते ही रहते हैं
अज़ीज़ हामिद मदनी
शेर
'मुसहफ़ी' मैं हूँ अब और जामा-ए-उर्यानी है
था कभी चाक-ए-मलामत से गरेबाँ आबाद